जहां इतिहास को मिटाया नहीं, सहेजा गया : गुलामी के दौर की निशानी आज भी सुरक्षित

संदीप शर्मा। सारंगढ़-बिलाईगढ़

सारंगढ़ के सेमरापाली गांव में 248 साल से सुरक्षित है ब्रिटिश अफसर अलेकजेंडर इलियट का स्मारक, स्थानीय लोगों ने पीढ़ियों से संभालकर रखी ऐतिहासिक धरोहर..

जिस देश ने करीब दो सौ वर्षों तक अंग्रेजी शासन का दौर देखा, उसी दौर के एक ब्रिटिश अफसर की कब्र आज भी छत्तीसगढ़ की धरती पर पूरी गरिमा के साथ सुरक्षित है। सारंगढ़ जिला मुख्यालय से करीब 12 किमी दूर गोमर्डा अभ्यारण्य की सीमा से लगे सेमरापाली गांव में 18वीं सदी का यह स्मारक आज भी उस दौर की कहानी कह रहा है। करीब 248 साल पहले यात्रा के दौरान जान गंवाने वाले ब्रिटिश अफसर अलेकजेंडर इलियट को यहीं दफन किया गया था। तब यह इलाका दुर्गम और कम आबादी वाला था, लेकिन समय के साथ यहां गांव बस गया। शासन बदला, पीढ़ियां बदलीं, आसपास का इलाका बदला, लेकिन इलियट की कब्र आज भी सुरक्षित है।
सेमरा गांव में मौजूद यह स्मारक अपने आप में इतिहास का एक पन्ना समेटे हुए है। गांव की रोजमर्रा की जिंदगी के बीच खड़ा यह पुराना निर्माण उस समय की याद दिलाता है, जब कोलकाता से नागपुर तक की यात्रा आज की तरह आसान नहीं थी। न पक्की सड़कें थीं, न आधुनिक चिकित्सा सुविधाएं और न ही आवागमन के साधन। इसी यात्रा के दौरान 12 सितंबर 1778 को 23 वर्षीय अलेकजेंडर इलियट की सेमरा क्षेत्र में मृत्यु हो गई थी।

23 साल की उम्र में थम गई जीवन यात्रा

अलेकजेंडर इलियट उस समय बंगाल के गवर्नर जनरल वॉरेन हेस्टिंग्स के दूत के रूप में कोलकाता से नागपुर की यात्रा पर निकले थे। यात्रा के दौरान सेमरा क्षेत्र में उनकी तबीयत बिगड़ी। तेज बुखार के बाद 12 सितंबर 1778 को उनकी मृत्यु हो गई। उस समय उनकी उम्र करीब 23 वर्ष थी।
साथ मौजूद ब्रिटिश सैनिकों और रियासत की सेना की टुकड़ी ने अंग्रेजी रीति-रिवाज के अनुसार उन्हें यहीं दफन किया। बाद में तत्कालीन बंगाल सरकार के आदेश पर उनकी स्मृति में स्मारक और शिलालेख बनवाया गया।

248 साल बाद भी मजबूत है पुराना निर्माण

दानसरा के सेवानिवृत्त शिक्षक कैलाश चंद्र शर्मा बताते हैं कि उन्होंने बुजुर्गों से इस स्मारक के बारे में कई बातें सुनी हैं। उनके अनुसार पहले स्मारक का स्वरूप छोटा था और चारों ओर सीमित बाउंड्री थी। समय के साथ इसके स्वरूप में बदलाव आया, लेकिन पुराने निर्माण की मजबूती लंबे समय तक बनी रही।
श्री शर्मा बताते हैं कि बुजुर्गों से सुनने को मिला था कि उस समय गुड़ और चूने के मिश्रण से जोड़ाई की जाती थी। पुराने निर्माण में इस्तेमाल इसी पारंपरिक तकनीक को इसकी मजबूती का एक कारण माना जाता है।

मुकुटधर पांडेय से मिली थी स्मारक की जानकारी

कैलाश चंद्र शर्मा बताते हैं कि छात्र जीवन में रायगढ़ में उनकी मुलाकात पद्मश्री स्वर्गीय मुकुटधर पांडेय से हुई थी। बातचीत के दौरान पांडेय जी ने दानसरा क्षेत्र के पास एक अंग्रेज अधिकारी की समाधि होने की जानकारी दी थी। इसके बाद से वे इस स्मारक के इतिहास में रुचि लेते रहे।

अंग्रेज अफसर की कब्र, लेकिन ग्रामीणों ने नहीं पहुंचाया नुकसान

ग्रामीणों के अनुसार यह बात सभी जानते हैं कि स्मारक एक ब्रिटिश अफसर की कब्र है। इसके बावजूद कभी किसी ने इसे नुकसान पहुंचाने की कोशिश नहीं की। समय-समय पर लोग यहां पहुंचते हैं और कुछ लोग श्रद्धास्वरूप फूल भी चढ़ाते हैं।
करीब ढाई सौ साल से सुरक्षित यह स्मारक अब केवल एक कब्र नहीं, बल्कि सेमरा गांव और आसपास के क्षेत्र के इतिहास की महत्वपूर्ण निशानी बन चुका है। गांव के बीच सुरक्षित यह स्मारक बीते समय और वर्तमान के बीच एक कड़ी की तरह दिखाई देता है।

संरक्षण के साथ इतिहास की जानकारी भी जरूरी

इतने पुराने स्मारक के बावजूद इसके इतिहास के बारे में बहुत कम लोगों को जानकारी है। ग्रामीणों का कहना है कि यहां स्मारक से संबंधित जानकारी वाला बोर्ड लगाया जाए और समय-समय पर इसकी देखरेख की जाए, तो नई पीढ़ी इस इतिहास से परिचित हो सकेगी।

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